Why Sheikh Hasina Return To Bangladesh Matters Now

Why Sheikh Hasina Return To Bangladesh Matters Now

बांग्लादेश की राजनीति इस समय बारूद के ढेर पर बैठी है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने हाल ही में घोषणा की है कि वे भारत से वापस अपने देश लौटेंगी और कोर्ट में खुद को सरेंडर करेंगी। भले ही उन्हें बांग्लादेश की अदालत से मौत की सजा मिल चुकी हो, लेकिन 78 वर्षीय नेता का यह दांव ढाका की सत्ता में बैठे लोगों की नींद उड़ाने के लिए काफी है।

जब भी कोई बड़ा नेता जेल जाने या मरने की परवाह किए बिना देश लौटने की बात करता है, तो खेल सिर्फ कानूनी नहीं रह जाता। यह पूरी तरह से राजनीतिक दांव होता है। क्या हसीना की वापसी से बांग्लादेश की राजनीतिक हवा बदलेगी? क्या उनकी पार्टी आवामी लीग फिर से उठ खड़ी होगी? एक्सपर्ट्स की राय और जमीन की हकीकत को बिना किसी लाग-लपेट के समझना जरूरी है।

मौत की सजा और सरेंडर का खेल

शेख हसीना का कहना है कि वे कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करने के लिए खुद ढाका आएंगी। साल 2024 के छात्र आंदोलन के बाद उन्हें देश छोड़ना पड़ा था। इसके बाद मोहम्मद यूनुस के अंतरिम प्रशासन और बाद में आई सरकार के दौरान उन पर कई मुकदमे चले और कोर्ट ने उन्हें मौत की सजा तक सुना दी।

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि हसीना का यह ऐलान एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। जब वे कहती हैं कि "वे मुझे गिरफ्तार कर सकते हैं, मार भी सकते हैं, फिर भी मुझे जाना है," तो वे सीधे-सीधे अपने समर्थकों में सहानुभूति की लहर पैदा करने की कोशिश कर रही हैं। दक्षिण एशिया की राजनीति में विक्टिम कार्ड हमेशा से काम करता आया है। अगर वे सच में ढाका एयरपोर्ट पर उतरती हैं, तो अंतरिम व्यवस्था और वर्तमान बीएनपी (BNP) सरकार के लिए उन्हें संभालना एक सिरदर्द बन जाएगा। उन्हें जेल में रखना या कड़ी सजा देना देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।

आवामी लीग का कैडर और जमीनी हकीकत

क्या हसीना के लौटते ही आवामी लीग के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आएंगे? जवाब इतना सीधा नहीं है। पिछले कुछ समय में आवामी लीग के दफ्तर बंद किए गए और पार्टी की गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए। कई बड़े नेता या तो देश से बाहर हैं या छिपे हुए हैं।

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि हसीना की तरफ से लगातार कार्यकर्ताओं को वापस सक्रिय होने के संदेश भेजे जा रहे हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर डर का माहौल अभी भी खत्म नहीं हुआ है। नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) जैसी कट्टरपंथी ताकतें और जमात-ए-इस्लामी के समर्थक साफ कह रहे हैं कि हसीना को वापस लाकर सीधे फांसी पर लटकाया जाना चाहिए। ऐसे में आम कार्यकर्ता खुलकर सामने आने से कतरा रहा है।

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों का तनाव

हसीना की भारत में मौजूदगी ने नई दिल्ली और ढाका के बीच लंबे समय से तनाव पैदा कर रखा है। बांग्लादेश लगातार भारत से उनके प्रत्यर्पण की मांग करता रहा है। भारत के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। एक तरफ भारत अपने पुराने और भरोसेमंद सहयोगी को सीधे संकट में नहीं धकेलना चाहता, वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश की नई सरकार के साथ रिश्ते सुधारना भी भारत की मजबूरी है।

अगर हसीना खुद आगे बढ़कर बांग्लादेश जाने का फैसला करती हैं, तो इससे भारत को एक बड़ी कूटनीतिक राहत मिलेगी। भारत पर से यह दबाव हट जाएगा कि वह एक 'अपराधी' को शरण दे रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या हसीना का यह कदम बांग्लादेश में भारत विरोधी ताकतों को और हवा देगा?

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क्या सच में पलट जाएगा गेम

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि बांग्लादेश की जनता में वर्तमान व्यवस्था को लेकर भी अब धीरे-धीरे असंतोष पनपने लगा है। जब महंगाई बढ़ती है और कानून-व्यवस्था पटरी से उतरती है, तो लोग पुरानी सरकार के दौर को याद करने लगते हैं। आवामी लीग इसी जनता की शॉर्ट-टर्म मेमोरी का फायदा उठाना चाहती है।

लेकिन गेम पूरी तरह पलट जाएगा, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। हसीना चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित हो चुकी हैं। उनकी वापसी का मकसद सत्ता पाना नहीं, बल्कि अपनी पार्टी को पूरी तरह खत्म होने से बचाना है। वे जानती हैं कि अगर वे भारत में ही बैठी रहीं, तो आवामी लीग का नामोनिशान मिट जाएगा। शेख मुजीबुर रहमान की विरासत को जिंदा रखने के लिए उनका बांग्लादेश की धरती पर होना जरूरी है, भले ही वह जगह जेल की कोठरी ही क्यों न हो।

बांग्लादेश की राजनीति आने वाले महीनों में और ज्यादा हिंसक और अस्थिर हो सकती है। हसीना का आत्मसमर्पण का फैसला कोई कानूनी मजबूरी नहीं, बल्कि ढाका की नई सत्ता को चुनौती देने की आखिरी राजनीतिक चाल है।

MG

Miguel Green

Drawing on years of industry experience, Miguel Green provides thoughtful commentary and well-sourced reporting on the issues that shape our world.