पैसा खर्च करने से क्या किसी देश की आबादी का संकट हल हो सकता है? सिंगापुर की सरकार इन दिनों इसी सवाल का जवाब तलाशने में जुटी है। दुनिया भर में जब जन्मदर में गिरावट आ रही है, तो सिंगापुर ने परिवारों को आर्थिक संबल देने के लिए एक ऐतिहासिक वित्तीय पैकेज का ऐलान किया है। प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग ने घोषणा की है कि सिंगापुर में अब हर बच्चे के जन्म पर सरकार लाखों रुपए की सीधी सहायता देगी। लेकिन क्या यह भारी-भरकम वित्तीय पैकेज लोगों की मानसिकता को बदल पाएगा या फिर यह सिर्फ आंकड़ों का खेल बनकर रह जाएगा?
सिंगापुर की नई वित्तीय सहायता योजना का पूरा गणित
अगर आप सोच रहे हैं कि यह योजना सिर्फ कागजी घोषणा है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। सिंगापुर के नेशनल डे रैली में प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग ने स्पष्ट किया कि आने वाले अप्रैल से देश में SG Child Support Package लागू किया जा रहा है। इसके तहत बच्चे के जन्म से लेकर उसके 17 साल के होने तक कुल मिलाकर करीब 70,000 सिंगापुर डॉलर (भारतीय मुद्रा में लगभग 52.5 लाख रुपए) की सीधी सहायता मिलेगी।
इस पूरी योजना को बहुत सोच-समझकर चरणों में बांटा गया है ताकि माता-पिता पर शुरुआती बोझ से लेकर पढ़ाई तक का दबाव कम हो सके:
- शुरुआती बेबी गिफ्ट: बच्चे के जन्म के पहले साल के भीतर माता-पिता को लगभग 10,000 सिंगापुर डॉलर (लगभग 7.5 लाख भारतीय रुपए) नकद दिए जाएंगे, जो दो किस्तों में मिलेंगे।
- सालाना चाइल्ड क्रेडिट्स: बच्चे के 1 साल से लेकर 16 साल की उम्र तक हर साल 2,000 सिंगापुर डॉलर के क्रेडिट्स दिए जाएंगे।
- सीडीए और एजुकेशन अकाउंट: चाइल्ड डेवलपमेंट अकाउंट (CDA) के लिए शुरुआती ग्रांट और सरकार द्वारा मैचिंग फंड्स के साथ-साथ 17 साल की उम्र पूरी होने पर पोस्ट-सेकेंडरी एजुकेशन अकाउंट में भारी भरकम टॉप-अप दिया जाएगा।
विशेष तथ्य: यह नई व्यवस्था पुरानी जटिल योजनाओं को रिप्लेस कर रही है। अब सहायता राशि बच्चे के जन्म क्रम (पहला या तीसरा बच्चा) पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि हर नागरिक बच्चे को समान और सीधा लाभ मिलेगा।
जन्मदर क्यों गिर रही है और क्या पैसा ही एकमात्र समाधान है
हकीकत यह है कि सिंगापुर की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) रिकॉर्ड निचले स्तर यानी 0.87 के आसपास पहुंच चुकी है। जबकि किसी भी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए प्रजनन दर कम से कम 2.1 होनी चाहिए। सरकार दशकों से बेबी बोनस दे रही है, फिर भी लोग परिवार बढ़ाने से कतरा रहे हैं।
यहाँ मुख्य समस्या सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि जीवनशैली, काम के लंबे घंटे, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना है। जब युवा यह देखते हैं कि बच्चे की परवरिश में कितनी मानसिक और शारीरिक ऊर्जा खर्च होती है, तो कई लाख रुपए भी उन्हें आकर्षित नहीं कर पाते। सिंगापुर में किए गए कई सर्वेक्षणों से यह सामने आया है कि एक बड़ा वर्ग स्वेच्छा से संतान सुख से दूर रहना पसंद कर रहा है।
दूसरे देश इस संकट से कैसे निपट रहे हैं
सिंगापुर अकेला ऐसा देश नहीं है जो इस जनसांख्यिकीय पझल से जूझ रहा है। दक्षिण कोरिया, जापान, हंगरी, फ्रांस और रूस जैसे देशों ने भी बंपर वित्तीय पैकेज, लंबी मैटरनिटी और पैटरनिटी छुट्टियां, तथा टैक्स छूट के जरिए जन्मदर बढ़ाने की तमाम कोशिशें की हैं। हंगरी में तो चार या उससे अधिक बच्चों वाली माताओं को जीवन भर आयकर (Income Tax) से छूट दी जाती है।
इसके बावजूद, दक्षिण कोरिया की प्रजनन दर दुनिया में सबसे कम बनी हुई है। इससे यह साफ साबित होता है कि सरकारी चेक या बैंक बैलेंस भले ही आर्थिक राहत देते हैं, लेकिन वे सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों की आंधी को रोक नहीं सकते।
भविष्य की राह और जमीनी हकीकत
यदि आप सोचते हैं कि केवल सरकारी अनुदान से रातों-रात आबादी बढ़ जाएगी, तो आप ज़मीनी सच्चाई से दूर हैं। सिंगापुर का यह नया कदम निश्चित रूप से उन माता-पिता के लिए एक बड़ा संबल है जो पहले से ही बच्चे पाल रहे हैं या जिनके मन में परिवार शुरू करने की इच्छा है। लेकिन जब तक काम और जीवन के बीच संतुलन (Work-Life Balance) बेहतर नहीं होता और चाइल्डकेयर का मानसिक तनाव कम नहीं होता, तब तक वित्तीय प्रोत्साहन भी एक सीमा से आगे असर नहीं दिखा पाएंगे।
नतीजा यह है कि सरकारें अपनी तिजोरी खोलने को तैयार हैं, पर समाज की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। अब देखना यह होगा कि क्या ये लाखों रुपए परिवारों की पसंद को बदल पाते हैं या आने वाले समय में देशों को और अधिक कठोर कदम उठाने पड़ेंगे।