ईरान का ‘आई फॉर एन आई’ ऑपरेशन और खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमले का पूरा सच

ईरान का ‘आई फॉर एन आई’ ऑपरेशन और खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमले का पूरा सच

मध्य पूर्व (Middle East) में तनाव अब उस मुहाने पर पहुंच चुका है जहां से वापसी का रास्ता बेहद मुश्किल नजर आ रहा है। अमेरिकी हमलों से बौखलाए ईरान ने अब एक बड़ा कदम उठाते हुए खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अपना निशाना बनाया है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने 'आई फॉर एन आई' (आंख के बदले आंख) नाम से एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया है। इस ऑपरेशन के तहत बहरीन, जॉर्डन और विशेष रूप से कुवैत में स्थित अमेरिकी एयरबेस पर ताबड़तोड़ मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए हैं।

ईरान का दावा है कि उसने इन हमलों में कुवैत के दो प्रमुख सैन्य ठिकानों पर मौजूद पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम और रडार प्रणालियों को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही यह जंग अब सीधे तौर पर उन खाड़ी देशों को अपनी लपेट में ले रही है जो लंबे समय से अमेरिकी सेना को अपनी जमीन पर पनाह दिए हुए हैं।

इस घटनाक्रम के पीछे की पूरी कहानी क्या है, ईरान ने किन ठिकानों को निशाना बनाया और इस हमले के बाद वैश्विक राजनीति और तेल के बाजार पर क्या असर पड़ने वाला है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

ईरान का 'आई फॉर एन आई' ऑपरेशन क्या है?

ईरान और अमेरिका के बीच पिछले कई महीनों से लगातार सैन्य टकराव चल रहा है। अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के भीतर और उसके सैन्य ठिकानों पर किए गए हमलों के जवाब में IRGC ने इस जवाबी कार्रवाई को अंजाम दिया। ईरान की सरकारी नूर न्यूज एजेंसी के मुताबिक, इस पूरे ऑपरेशन की रूपरेखा पिछले 48 घंटों से अमेरिकी गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के बाद तैयार की गई थी।

ईरान ने इस सैन्य अभियान को तीन अलग-अलग चरणों (stages) में अंजाम दिया है:

  • पहला चरण: ईरान के एयरोस्पेस बलों ने सबसे पहले जॉर्डन में स्थित प्रिंस हसन एयरबेस (Prince Hassan Airbase) को मिसाइलों और ड्रोनों से निशाना बनाया। ईरान का आरोप है कि अमेरिका इस बेस का इस्तेमाल अवैध हवाई गतिविधियों और उसके नेविगेशन सिस्टम को बाधित करने के लिए कर रहा था। हमले में ईंधन डिपो और गोला-बारूद के गोदामों में भीषण आग लगाने का दावा किया गया है।
  • दूसरा चरण: इस चरण में बहरीन में स्थित शेख ईसा एयरबेस (Sheikh Isa Airbase) पर हमला बोला गया। यह बेस अमेरिकी नौसेना और हवाई संचालन के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • तीसरा चरण: इस अभियान का सबसे आक्रामक और घातक हमला कुवैत पर हुआ। कुवैत में मौजूद दो बेहद संवेदनशील अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर वहां भारी तबाही मचाने का दावा किया गया है।

कुवैत के किन सैन्य ठिकानों को बनाया गया निशाना?

कुवैत खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति का एक बड़ा केंद्र रहा है। ईरान ने अपनी रणनीतिक योजना के तहत कुवैत के निम्नलिखित दो एयरबेस को निशाना बनाया:

1. अली अल-सलेम एयरबेस (Ali Al-Salem Air Base)

यह बेस कुवैत में अमेरिकी वायु सेना के संचालन का मुख्य केंद्र है। IRGC का दावा है कि उनके सटीक ड्रोन और मिसाइल हमलों ने यहां तैनात अमेरिकी पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम (Patriot Air Defense System) को पूरी तरह तबाह कर दिया। इसके अलावा वहां मौजूद ईंधन टैंकों (Fuel Tanks) को भी निशाना बनाया गया जिससे बेस पर भारी आग लग गई। पैट्रियट सिस्टम को अमेरिकी सुरक्षा का सबसे मजबूत ढाल माना जाता है, और इसका तबाह होना अमेरिकी रक्षा तैयारियों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

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2. अहमद अल-जाबेर एयरबेस (Ahmed Al-Jaber Air Base)

यह कुवैत का दूसरा प्रमुख सैन्य ठिकाना है जहां अमेरिकी सैनिक तैनात रहते हैं। इस बेस पर ईरान ने अमेरिकी सर्विलांस और ट्रैकिंग क्षमताओं को पंगु बनाने के उद्देश्य से हमला किया। IRGC के मुताबिक, इस एयरबेस पर तैनात शक्तिशाली FPS रडार सिस्टम को हमलों में पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है। रडार सिस्टम के नष्ट होने से इस क्षेत्र में अमेरिकी वायुसेना की निगरानी क्षमता को बड़ा झटका लगा है।

होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान की सख्त चेतावनी

मिसाइल हमलों के तुरंत बाद ईरान ने सिर्फ सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने तक ही अपने कदम नहीं रोके, बल्कि उसने अमेरिका को सीधे तौर पर आर्थिक और व्यापारिक मोर्चे पर भी ललकारा है। ईरान ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और उसके आसपास के समुद्री इलाकों में किसी भी बाहरी या अमेरिकी हस्तक्षेप को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुजरता है। ईरान इस जलमार्ग पर अपना ऐतिहासिक नियंत्रण होने का दावा करता रहा है, जबकि अमेरिकी सेना (CENTCOM) का कहना है कि यह एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री गलियारा है और ईरान का इस पर कोई एकाधिकार नहीं है। ईरान की इस ताजा धमकी के बाद दुनिया भर के बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर से उछाल आने की आशंका पैदा हो गई है।

इस हमले के वैश्विक और रणनीतिक निहितार्थ

ईरान का यह हमला सिर्फ एक सैन्य जवाबी कार्रवाई नहीं है, बल्कि इसके गहरे भू-राजनीतिक निहितार्थ हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता:

  • खाड़ी देशों के लिए धर्मसंकट: कुवैत, बहरीन और जॉर्डन जैसे देश हमेशा से अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते रहे हैं। अपनी जमीन पर अमेरिकी बेस होने की वजह से अब ये देश सीधे तौर पर युद्ध के मैदान में तब्दील हो रहे हैं। इन्हें अब अपनी सुरक्षा नीतियों पर नए सिरे से विचार करना होगा।
  • पैट्रियट डिफेंस सिस्टम की साख पर सवाल: अमेरिकी पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम को दुनिया का सबसे अचूक मिसाइल रोधी तंत्र माना जाता रहा है। यदि ईरान के दावे के मुताबिक पैट्रियट मिसाइलें इन हमलों को रोकने में पूरी तरह नाकाम रहीं और खुद तबाह हो गईं, तो यह अमेरिकी सैन्य तकनीक की साख को बड़ा नुकसान पहुंचाएगा।
  • वैश्विक ऊर्जा संकट का खतरा: यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह जंग होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को रोकती है, तो दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। इससे पहले से ही महंगाई से जूझ रही वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक और बड़ा झटका लग सकता है।

अब आगे क्या होगा, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि वाशिंगटन इस नुकसान पर क्या प्रतिक्रिया देता है। क्या अमेरिका ईरान के भीतर और सीधे हमले करेगा, या फिर तनाव को कम करने के लिए बैक-चैनल डिप्लोमेसी का सहारा लिया जाएगा? आने वाले कुछ दिन मध्य पूर्व के भविष्य के लिहाज से बेहद नाजुक होने वाले हैं।

MG

Miguel Green

Drawing on years of industry experience, Miguel Green provides thoughtful commentary and well-sourced reporting on the issues that shape our world.