क्यों चीन कभी नहीं चाहेगा कि यूक्रेन युद्ध जल्दी खत्म हो

क्यों चीन कभी नहीं चाहेगा कि यूक्रेन युद्ध जल्दी खत्म हो

रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग को लेकर आप जो भी सोच रहे हैं, उसे थोड़ी देर के लिए भूल जाइए। यह लड़ाई अब सिर्फ दो देशों की नहीं रह गई है। नाटो (NATO) के पूर्व सैन्य प्रमुख एडमिरल रॉब बाउर ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है। उनका साफ कहना है कि चीन ही वह ताकत है जो रूस को इस युद्ध में टिकाए हुए है। अगर चीन आज हाथ खींच ले, तो व्लादिमीर पुतिन के लिए युद्ध जारी रखना नामुमकिन हो जाएगा।

यह कोई सामान्य बयान नहीं है। यह उस कड़वे सच का खुलासा है जिसे अब तक केवल इशारों में कहा जा रहा था। सच तो यह है कि रूस इस समय पूरी तरह से चीन का एक 'सैटेलाइट स्टेट' या पिछलगू बनकर रह गया है।

बीजिंग का दोहरा खेल और पुतिन की मजबूरी

लोग अक्सर पूछते हैं कि चीन खुलकर रूस के समर्थन में सेना क्यों नहीं उतारता? जवाब सीधा है। चीन को अपनी सेना भेजने की जरूरत ही नहीं है। वह पर्दे के पीछे से रूस की अर्थव्यवस्था और उसकी सैन्य मशीनरी को ऑक्सीजन दे रहा है। जब पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तब चीन ने रूसी तेल और गैस की खरीद बढ़ा दी। उसने रूस के बाजारों को वे जरूरी तकनीक और कलपुर्जे मुहैया कराए जो हथियारों के निर्माण के लिए जरूरी हैं।

बाउर के विश्लेषण के मुताबिक, चीन का मकसद रूस को जिताना नहीं है। वह तो बस रूस को हारने से बचा रहा है। बीजिंग के लिए यह एक बेहतरीन सौदा है। जब तक यह युद्ध खिंचेगा, तब तक अमेरिका और पूरा यूरोपीय देश इसमें उलझे रहेंगे। पश्चिमी देशों का ध्यान, उनका पैसा और उनके हथियार यूक्रेन की रक्षा में खर्च होते रहेंगे। इससे चीन को अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने का खुला मैदान मिल जाता है।

दो मोर्चों पर युद्ध का वो खतरनाक प्लान

इस पूरे मामले में सबसे डरावना पहलू कुछ और है। नाटो के रणनीतिकार अब एक नए खतरे को भांप रहे हैं। क्या चीन के कहने पर रूस किसी यूरोपीय देश पर हमला कर सकता है? एडमिरल बाउर इस आशंका से इनकार नहीं करते।

मान लीजिए कल को चीन ताइवान पर चढ़ाई करने का फैसला करता है। उस स्थिति में वह चाहेगा कि अमेरिका ताइवान की मदद के लिए न आ पाए। अमेरिका को रोकने का सबसे आसान तरीका क्या होगा? चीन रूस को उकसा सकता है कि वह किसी नाटो सदस्य देश, जैसे पोलैंड या बाल्टिक देशों की सीमा पर तनाव बढ़ा दे या छोटा हमला कर दे।

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ऐसा होते ही अमेरिका दो मोर्चों पर घिर जाएगा। उसे एक तरफ यूरोप की रक्षा करनी होगी और दूसरी तरफ एशिया-प्रशांत क्षेत्र में ताइवान को बचाना होगा। यह एक ऐसी सैन्य चुनौती होगी जिससे निपटना दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के लिए भी बेहद मुश्किल हो जाएगा।

युद्ध के मैदान की कड़वी हकीकत

इस समय यूक्रेन के कब्जे वाले इलाकों में लगभग 7,00,000 रूसी सैनिक मौजूद हैं। इतनी बड़ी संख्या को देखते हुए यह मान लेना कि कोई भी एक पक्ष इस युद्ध में पूरी तरह से विजयी होकर निकलेगा, बचकाना होगा। न तो यूक्रेन आसानी से इन रूसी सैनिकों को अपनी जमीन से पूरी तरह खदेड़ सकता है, और न ही रूस यूक्रेन के जज्बे को तोड़ पा रहा है।

पश्चिमी देशों ने शुरुआत में एक बड़ी गलती की। साल 2022 में जब यूक्रेनी सेना रूसी सेना को पीछे धकेल रही थी, तब अगर यूक्रेन को मांग के मुताबिक सारे आधुनिक हथियार मिल गए होते, तो आज तस्वीर कुछ और होती। तब की हिचकिचाहट आज पूरी दुनिया पर भारी पड़ रही है। रक्षा उद्योग की सुस्ती भी एक बड़ी समस्या है। युद्ध के पांचवें साल में होने के बावजूद पश्चिमी देश अभी भी अपने रक्षा बजट को बढ़ाने और हथियारों का उत्पादन तेज करने के लिए आपस में बहस कर रहे हैं। यह स्थिति आत्मघाती है।

अब आगे क्या करना होगा

अगर पश्चिमी दुनिया और भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों को इस चीनी चाल से बचना है, तो रणनीति बदलनी होगी। केवल प्रतिबंध लगाने से काम नहीं चलेगा।

सबसे पहले, यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करनी होगी। उन्हें अपने सैन्य उत्पादन को युद्ध स्तर पर बढ़ाना होगा। दूसरा, चीन पर आर्थिक दबाव बनाना होगा ताकि वह रूस को दी जाने वाली 'बैकडोर' मदद को रोकने पर मजबूर हो। जब तक बीजिंग को रूस की मदद करने की आर्थिक कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी, वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आने वाला।

समय तेजी से निकल रहा है। अगर अब भी सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो ताइवान से लेकर यूरोप की सीमाओं तक एक ऐसा संकट खड़ा हो जाएगा जिसे संभालना किसी के बस में नहीं होगा।

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LA

Luna Adams

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