वाशिंगटन में फिर से वही हुआ जिसकी सबको उम्मीद थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से अपनी आक्रामक बयानबाजी से अंतरराष्ट्रीय मंच पर खलबली मचा दी है। उन्होंने दावा किया कि ईरान ने अपने ही 52,000 प्रदर्शनकारियों को मौत के घाट उतार दिया। इस सनसनीखेज बयान के साथ ही उन्होंने ईरान पर फिर से कड़ा नौसैनिक प्रतिबंध लगाने और सैन्य हमले जारी रखने का ऐलान कर दिया।
लेकिन क्या वाकई तेहरान की सड़कों पर 52 हजार लोगों का खून बहा है? या फिर यह ट्रंप का कोई नया राजनीतिक दांव है? इस बड़े दावे के पीछे का सच बेहद पेचीदा है। चलिए इस पूरी कहानी की तह तक जाते हैं। Don't forget to check out our earlier coverage on this related article.
आंकड़ों का यह हेरफेर आखिर क्या है
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों को देखें तो ट्रंप का यह दावा जमीनी हकीकत से काफी अलग नजर आता है। असल में अमेरिका स्थित मानवाधिकार संगठन 'Human Rights Activists News Agency' (HRANA) ने इस साल की शुरुआत में ईरान में जारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों के जो आंकड़े जारी किए थे, उनमें कुछ अलग ही हकीकत बयां की गई थी।
संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान में हिंसक प्रदर्शनों के दौरान लगभग 7,002 लोगों की मौत हुई थी और 52,000 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप ने हमेशा की तरह अपनी चिरपरिचित शैली में इन दोनों आंकड़ों को आपस में मिला दिया। उन्होंने 52,000 की गिरफ्तारियों की संख्या को सीधे 'मारे गए लोगों' की संख्या में बदल दिया। If you want more about the history of this, USA.gov provides an in-depth breakdown.
यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इस तरह के अतिशयोक्तिपूर्ण आंकड़ों का इस्तेमाल किया है। अपनी बात में वजन पैदा करने और ईरान के खिलाफ कड़े फैसलों को सही ठहराने के लिए उन्होंने इस आंकड़े को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। तेहरान की क्रूरता जगजाहिर है, लेकिन 52 हजार प्रदर्शनकारियों को मार डालने का दावा बिना किसी ठोस सबूत के सिर्फ एक राजनीतिक हथकंडा लगता है।
दो दिन पहले बनी बात आखिर क्यों बिगड़ी
ट्रंप ने मीडिया के सामने आकर यह भी खुलासा किया कि सिर्फ दो दिन पहले दोनों देशों के बीच एक बड़ा समझौता लगभग तय हो चुका था। लेकिन ईरान आखिरी वक्त पर मुकर गया। उसने समझौते की शर्तों को मानने के बजाय और बातचीत करने की मांग रख दी।
"हमने दो दिन पहले उनके साथ एक डील फाइनल की थी। फिर वे बोले कि हम इस समझौते को अभी स्वीकार नहीं कर सकते, हमें और बातचीत करनी है। वे पिछले 47 सालों से यही खेल खेलते आ रहे हैं।" - डोनाल्ड ट्रंप
ट्रंप का गुस्सा इसी बात पर फूटा। उनका मानना है कि ईरान बातचीत के नाम पर सिर्फ वक्त बर्बाद करता है। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि अब वह इस तरह की टालमटोल की नीति को बर्दाश्त नहीं करेगा। जब कूटनीति काम नहीं आई, तो ट्रंप ने सेना को खुली छूट देने का फैसला किया।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर फिर से शिकंजा
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर पड़ा है। यह समुद्री रास्ता दुनिया भर के तेल व्यापार की रीढ़ की हड्डी है। ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करके ईरान पर फिर से नौसैनिक नाकेबंदी लागू कर दी है।
यह प्रतिबंध बेहद रणनीतिक है। यह दुनिया के बाकी देशों के जहाजों पर लागू नहीं होगा। यह नाकेबंदी सिर्फ और सिर्फ ईरान और उसके साथ व्यापार करने वाले देशों के जहाजों के लिए है। अगर कोई भी देश या कंपनी ईरान से तेल या कोई भी सामान खरीदती है, तो अमेरिकी नौसेना उसके जहाजों को इस रास्ते से गुजरने नहीं देगी।
ट्रंप ने इसके साथ ही एक और विवादित घोषणा की है। इस रणनीतिक रास्ते से गुजरने वाले हर एक कमर्शियल कार्गो और तेल टैंकर पर अमेरिका अब 20 प्रतिशत 'सुरक्षा शुल्क' या टैक्स वसूलेगा। ट्रंप का तर्क है कि इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित रखने में अमेरिका का बहुत खर्च होता है, इसलिए इसका इस्तेमाल करने वाले अमीर देशों को भी इसमें योगदान देना होगा। इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आने की आशंका है।
सैन्य हमलों की नई लहर और भारी तबाही
ट्रंप प्रशासन अब केवल कूटनीतिक दबाव तक सीमित नहीं है। अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य ठिकानों पर विनाशकारी हमले शुरू कर दिए हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने पुष्टि की है कि अमेरिकी लड़ाकू विमानों, ड्रोनों और मिसाइलों ने ईरान के भीतर 140 से ज्यादा सैन्य ठिकानों को तबाह कर दिया है।
ट्रंप ने खुद इन हमलों की भयावहता का विवरण देते हुए बताया कि अमेरिकी सेना ईरान की आक्रामक क्षमताओं को पूरी तरह खत्म करने के करीब है। उनके मुताबिक:
- ईरान की नौसेना को मात्र एक महीने के भीतर लगभग नेस्तनाबूद कर दिया गया है।
- ईरान की वायुसेना अब पूरी तरह से बेअसर हो चुकी है।
- ईरान के ड्रोन बनाने वाले लगभग 92 प्रतिशत कारखानों को मलबे में बदल दिया गया है।
- ईरान की मिसाइल उत्पादन क्षमता को भी 89 प्रतिशत तक नष्ट कर दिया गया है।
अमेरिकी सेना का दावा है कि ये हमले तब तक जारी रहेंगे जब तक ईरान बातचीत की मेज पर पूरी तरह झुक नहीं जाता।
वैश्विक बाजारों और अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर
इस सैन्य टकराव का सीधा असर वैश्विक शेयर बाजारों और कच्चे तेल की कीमतों पर दिख रहा है। साल 2026 की शुरुआत से ही जब भी सप्ताहांत में अमेरिका और ईरान के बीच झड़पें तेज होती हैं, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं।
हालांकि सोमवार आते-आते ट्रंप के कूटनीतिक बयानों से बाजार को थोड़ी राहत मिलती है। शेयर बाजार के विशेषज्ञ इसे 'एक्सियोस पुट' (Axios Put) का नाम दे रहे हैं, जहां सैन्य एक्शन के ठीक बाद शांति वार्ताओं की खबरों से बाजार को गिरने से बचा लिया जाता है।
लेकिन यह अस्थिरता कब तक चलेगी? ईरान की बदहाल आर्थिक स्थिति इसका सबूत है। कुछ महीने पहले तक ईरान में महंगाई दर केवल पांच प्रतिशत के आसपास थी, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों और हमलों के बाद यह तीन सौ पचास प्रतिशत को भी पार कर चुकी है। ईरान के पास अब इस युद्ध को लंबे समय तक खींचने के लिए आर्थिक ताकत नहीं बची है।
इस टकराव का अंतिम अंजाम क्या होगा
ट्रंप की यह रणनीति ईरान को पूरी तरह से अलग-थलग करने की है। ईरान के पास अब बहुत कम विकल्प बचे हैं। उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है, सैन्य बुनियादी ढांचा टूट रहा है और आम जनता पहले ही सरकार के खिलाफ सड़कों पर है।
अब आगे क्या होगा? अमेरिकी सरकार ने साफ कर दिया है कि अगर ईरान को जिंदा रहना है तो उसे कड़े समझौतों को बिना किसी शर्त के स्वीकार करना होगा। इस बेहद संवेदनशील मोड़ पर सबसे समझदारी भरे कदम क्या हो सकते हैं:
- तेल बाजारों की हलचल पर नजर: अगर आप ऊर्जा क्षेत्र या शेयर बाजार से जुड़े हैं, तो होर्मुज संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतों में आने वाले उतार-चढ़ाव पर बारीक नजर रखना जरूरी है।
- अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी नीति में बदलाव: वैश्विक परिवहन कंपनियों को होर्मुज के बजाय वैकल्पिक और सुरक्षित समुद्री मार्गों की तलाश तेज करनी होगी क्योंकि 20 प्रतिशत सुरक्षा टैक्स मुनाफे को भारी नुकसान पहुंचाएगा।
- मध्य पूर्व में नए सुरक्षा समीकरण: इस जंग के बाद ईरान समर्थित अन्य चरमपंथी गुटों की गतिविधियों में तेजी आ सकती है, जिसके लिए पड़ोसी देशों को अपनी सुरक्षा तैयारियों को पुख्ता करना होगा।
ट्रंप का यह दांव ईरान की सत्ता को घुटनों पर लाने के लिए है, लेकिन इस खेल में दांव पर पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिरता लगी हुई है।